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पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुआ NATO जैसा बड़ा रक्षा समझौता, एटमी हथियार का भी इस्तेमाल शामिल

सऊदी अरब-पाकिस्तान का रक्षा समझौता: क्या है 'इस्लामिक नाटो', भारत को क्यों है चिंता? | Islamic NATO

Islamic Nato? Saudi Arabia-Pakistan defence pact - what it means for India

रियाध/नई दिल्ली : (Islamic Nato) सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने बुधवार को एक रक्षा समझौते पर साइन किए। इस समझौते के तहत अगर किसी एक देश पर कोई बाहरी हमला होता है, तो उसे दोनों देशों पर हुआ हमला माना जाएगा। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि इस समझौते में परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का जिक्र भी है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

दोनों देशों ने एक जॉइंट स्टेटमेंट में कहा कि यह समझौता दोनों देशों की सुरक्षा बढ़ाने और विश्व में शांति स्थापित करने की प्रतिबद्धता को दिखाता है। इस समझौते के तहत दोनों देशों के बीच डिफेंस कॉर्पोरेशन भी डेवलप किया जाएगा।

समझौते के पीछे इजराइल (Israel) का बढ़ता खौफ और आक्रामकता

सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए इस समझौते के पीछे मध्य पूर्व में इजराइल (Israel) का बढ़ता खौफ और आक्रामकता है। खासकर कतर जैसे मुस्लिम देशों पर इजराइल (Israel) के हवाई हमलों के बाद, खाड़ी देशों में यह डर बढ़ गया है कि इजराइल पूरे क्षेत्र में बिना किसी रोक-टोक के सैन्य कार्रवाई कर सकता है। इस समझौते को इजराइल (Israel) की संभावित आक्रामकता का मुकाबला करने के लिए एक रक्षात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है। मुस्लिम देशों में एक संयुक्त रक्षा तंत्र की आवश्यकता महसूस की गई है ताकि वे इजराइल (Israel) की सैन्य ताकत का सामूहिक रूप से जवाब दे सकें।

अमेरिका पर अपनी निर्भरता घटाना चाहते हैं मुस्लिम देश

पारंपरिक रूप से, सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर बहुत अधिक निर्भर रहे हैं। हालांकि, इजराइल (Israel) के प्रति अमेरिका के मजबूत समर्थन के कारण इन देशों का वाशिंगटन पर से भरोसा कम हुआ है। उन्हें यह एहसास हो गया है कि अगर इजराइल (Israel) के साथ उनका कोई सैन्य टकराव होता है, तो अमेरिका शायद उनका साथ नहीं देगा। इसलिए, वे अपनी रक्षा के लिए एक ऐसा सहयोगी ढूंढ रहे थे जो अमेरिका पर निर्भर न हो। पाकिस्तान, जिसके पास परमाणु क्षमता है, इस भूमिका के लिए एक आदर्श विकल्प के रूप में उभरा है।

पाकिस्तान की परमाणु क्षमता का उपयोग

पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र परमाणु-सशस्त्र मुस्लिम देश है। इस समझौते के माध्यम से, सऊदी अरब को एक तरह से पाकिस्तान की परमाणु क्षमता का लाभ मिलता है, भले ही यह औपचारिक रूप से घोषित न हो। पाकिस्तान अपने परमाणु और मिसाइल प्रणालियों को पूरे मध्य पूर्व को सुरक्षित रखने के लिए एक निवारक के रूप में पेश कर रहा है।

चीन की भूमिका

इस समझौते में चीन की भी परोक्ष भूमिका हो सकती है। चीन, जो पाकिस्तान का करीबी सहयोगी है, मध्य पूर्व में अमेरिका के प्रभाव को कम करने का इच्छुक है। सऊदी अरब ने हाल के वर्षों में चीन के साथ रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग बढ़ाया है। यह समझौता चीन को इस क्षेत्र में अपनी भू-राजनीतिक पकड़ मजबूत करने का अवसर देता है।

इस्लामिक नाटो (Islamic Nato) बनने की शुरुआत

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुआ यह समझौता “इस्लामिक नाटो (Islamic Nato)” की अवधारणा को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि, यह समझौता अपने आप में पूर्ण “Islamic Nato” नहीं है, लेकिन इसके कुछ पहलू इस विचार को मजबूती देते हैं।

इसे “Islamic Nato” की शुरुआत क्यों माना जा रहा है, इसके मुख्य कारण इस प्रकार हैं:

भारत की चिंताएं

सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए रणनीतिक रक्षा समझौते को लेकर भारत की चिंताएं वाजिब हैं, क्योंकि इसका भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक समीकरणों पर गहरा असर पड़ सकता है। भारत सरकार ने इस पर सतर्कतापूर्वक प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि वह समझौते के प्रभावों का अध्ययन करेगी।

इस समझौते से भारत को मुख्य रूप से निम्नलिखित चिंताएं हैं:

कुल मिलाकर, भारत इस समझौते को एक प्रतीकात्मक और रणनीतिक झटका मानता है। भारत के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए, जिसमें इजराइल के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना और खाड़ी देशों के साथ कूटनीतिक संबंध मजबूत करना शामिल हो सकता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह समझौता भारत के हितों के खिलाफ न हो।

भारत ने दी सधी हुई और सतर्क प्रतिक्रिया

सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए रणनीतिक रक्षा समझौते पर भारत ने एक सधी हुई और सतर्क प्रतिक्रिया दी है। भारत ने सीधे तौर पर इस समझौते की निंदा नहीं की है, लेकिन अपनी चिंताओं को स्पष्ट कर दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत सरकार को इसकी जानकारी पहले से थी।

भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह इस समझौते के प्रभावों का “अध्ययन” कर रहा है। यह एक कूटनीतिक भाषा है जिसका अर्थ है कि भारत सरकार इस समझौते से अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ने वाले संभावित खतरों का बारीकी से विश्लेषण कर रही है।

विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा है कि भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इसका मतलब यह है कि भारत इस समझौते से उत्पन्न होने वाली किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है।

भारत यह भी जानता है कि सऊदी अरब के साथ उसके संबंध बहुत मजबूत हैं, जो ऊर्जा और व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार है। इसलिए, भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब का यह समझौता भारत के साथ उसके द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित न करे।

 

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